हमारा साधुवाद और बिच्छू
बचपन मे एक कहानी पढी थी,....एक साधू सुबह सुबह नदी किनारे जाता है। वहाँ देखता है की एक बिच्छू पानी की धार मे बह रहा है। साधू उसे बचाने लगता है। इसी क्रम मे बिच्छू उसे कई बार अपना जहरीला डंक भी मार मारता है। अंततः साधू उसे बचा लेता है पर जहर के असर से खुद बेसुध हो जाता है।

आप लोगों मे से भी कुछ लोगों ने पढी होगी, मुझे यह समझ मे नही आता कि ऎसी कहानियाँ हमारे यहाँ ही बच्चों को क्यों पढ़ाई जाती है। दरअसल हम साधुवाद मे कुछ ज्यादा ही यकीन रखते है। यही बिच्छू अगर पडोसी चरमपंथी के यहाँ किसी नदी मे बह रहा होता तो वहाँ के मौलवी क्या एक आम आदमी भी उसका क्या करेगा यह सब को मालुम है।
एक बात और की उस साधू ने बिच्छू को बचा कर अच्छा नही किया खुद तो बेसुध पड़ा है और दुसरे कि जिंदगी भी ख़तरे मे डाल दी। यह कैसा साधुवाद है मेरी समझ मे नही आता। चरमपंथी हमे डंक पे डंक मारे जा रहे है हम अपनी सधुवादिता दिखा रहे है।
मुम्बई बम काण्ड, ट्रेन ब्लास्ट, प्लेन हाई जैक होता है, यहाँ तक की भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद पे ये बिच्छू डंक मारते हैं। क्या करते हैं हम उनको बचा कर औरों कि जिंदगी फिर ख़तरे मे डाल देते है। सारे आरोपी या तो बरी हो जाते है या उन्हें उमर क़ैद कि सज़ा दी जाती है एक आध को मौत कि सज़ा दी भी गयी तो हमारा साधुवाद सामने आ जाता है और वो फिर से आजाद हो जाता है।
एक बात और की उस साधू ने बिच्छू को बचा कर अच्छा नही किया खुद तो बेसुध पड़ा है और दुसरे कि जिंदगी भी ख़तरे मे डाल दी। यह कैसा साधुवाद है मेरी समझ मे नही आता। चरमपंथी हमे डंक पे डंक मारे जा रहे है हम अपनी सधुवादिता दिखा रहे है।
मुम्बई बम काण्ड, ट्रेन ब्लास्ट, प्लेन हाई जैक होता है, यहाँ तक की भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद पे ये बिच्छू डंक मारते हैं। क्या करते हैं हम उनको बचा कर औरों कि जिंदगी फिर ख़तरे मे डाल देते है। सारे आरोपी या तो बरी हो जाते है या उन्हें उमर क़ैद कि सज़ा दी जाती है एक आध को मौत कि सज़ा दी भी गयी तो हमारा साधुवाद सामने आ जाता है और वो फिर से आजाद हो जाता है।
हमे ऐसे ही सधुवादिता दिखाती रहनी चाहिऐ?