Tuesday 17 July 2007

मियां चिरौंजी लाल

चिरौंजी लाल जी एक नामी गिरामी कम्पनी मे कार्यरत है। "औधोगिक संबंध" विभाग मे बड़ा बाबु के पोस्ट पर काम करते हुए उनके संबंध काफी बडे दायरे मे है। संबंध बनाने मे माहिर चिरौंजी लाल जी हमारे कार्यालय मे टंगे हुए कुछ चित्रकारी से काफी प्रभावित हैं और उस चित्र का जो भावार्थ है उसे अपनी जिंदगी मे अमल लाने की जी-तोड़ कोशिश करते रहते हैं।

वो कहते हैं ना " जवानी का दीया बुढ़ापे मे एक बार जोर से फाद्फादाता है " चिरौंजी लाल जी के रिटायर होने मे एक दो साल बचे हैं। पर वह रे जवानी, आये दिन नीली फिल्म देखने के नए नए तरीके इजाद करते रहते है। मियां चिरौंजी को कंप्यूटर काम करने के लिए ही दिया गया है इसलिये वो इसका इस्तेमाल सौ प्रतिशत काम इच्छा मे ही लगते है। कंप्यूटर स्कैन करने पर सिस्टम फ़ाइल से ज्यादा काम कि फ़ाइल ही दिखेंगी आपको। बेचारे इस उमर मे भी इतना काम करते है किसी को इसकी फिकर ही नही है। पर चलो एक पंथ दो काज "इन्नोवेशन का इन्नोवेशन और काम का काम" भला इसमे कम्पनी को क्या एतराज हो सकता है।

" हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा " साहस हो तो आप बड़ी से बड़ी दरिया मे भी छलांग मर सकते हैं जनाना प्रसाधन (टॉयलेट) क्या बात है। चिरौंजी लाल जी के रूम से दस पन्द्रह कदम पे मरदाना प्रसाधन (टॉयलेट) अपनी जानी पहचानी महक के साथ उनके स्वागत के लिए हमेशा तैयार रहता है। पर हाय रे उसकी किस्मत मियां चिरौंजी वक़्त बरबाद करने मे यकीं ही नही रखते हैं और पास वाले जानना प्रसाधन मे ही कूद पड़ते हैं। ऐसे मे औधोगिक संबंध के साथ और भी कई संबंध अपने आप बन पड़ते हैं।

लाइफ मे जब तक अपने रिस्क नही लिया तब तक आपको कुछ हासिल नही हो सकता। धीरू भाई अम्बानी ने भी रिस्क ही लिया था कहॉ से कहॉ पहुंच गए। मियां चिरौंजी ने भी रिस्क लिया सड़क से हॉस्पिटल पहुंच गए और उनकी बसंती बाबु भाई के गैराज। हमारे यहाँ ऑफिस जाने का समय ९ बजे का है और १५ मिनट का ग्रेस इस लिए दिया जाता कि आप इसका इस्तेमाल अपने बुरे वक़्त मे करें। पर वाह रे मियां चिरौंजी ९ बजे से ९:१५ तक उनका बुरा वक़्त ही चलता है। ठीक ९:१३ पर उनकी बसंती धुआं का गुब्बार छोड़ती हुई लड़खड़ा कर पंच हाउस के पास रुकती है और मियां अपना कार्ड रगड़ मर कर आराम से ऑफिस जाते हैं। ९:१५ से पहले उनको खोजना भी रिस्क कि ही बात है।

कार्यों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता तो देखते ही बनती है। कोई रेफ़रेंस पेपर माँग कर देख लो आप उनसे आप भूल जायेंगे पर वो नही भूलते हफ्ते बाद भी पपेर आपके पास जरुर पहूँच जाएगा हालांकि उनका मुख्य काम फ़ाइल कि देख रेख करना ही है। ठीक ४:४५ पे चिरौंजी लाल जी का डेस्क काम करना बंद कर देता है। समय पर घर पहुँचने कि प्रतिबद्धता जो है, बरना उनकी गली के कुत्ते नाराज हो जाते हैं। उनकी बकरी दूध देना बंद कर देती है। बेगम साहिबा फिर उनका ही इन्तजार करती है। कम्पनी भी खुश है, आज कल ऐसे लोग मिलते ही कहॉ है।

4 comments:

Anonymous said...

Good expression

उमाशंकर सिंह said...

मज़ेदार है विनोद बाबू। लिखते रहिए ऐसे ही

Anonymous said...

वाह! ऐसे चिरौंजी लाल जी तो हमारे आसपास भी हैं।

PRASHANT said...

tHIS IS fANTASTIC man!!! kEEP THE FLAME BURNING............