Wednesday 4 July 2007

एक कहानी- भाग ४

गावं आकर देखा तो सब कुछ बदल गया था। माँ बिल्कुल कमजोर हो गयी थी शायद पिताजी के मरने के बाद उनकी हालत और खराब हो गयी थी। अब मेरे पास घर और माँ की देखभाल के अलावा और कोई काम नही था । हालांकि माँ काफी कमजोर हो गयी थी फिर भी वह मेरी शादी के लिए फिर से जी तोड़ कोशिश मे जुट गयी। शायद उनको एक वारिस कि तलाश थी, खैर माँ अपने कोशिश मे कामयाब नही हो पायी क्यों कि मैं राजी नही हुआ। कई रिश्ते आये भी और चले गए।

इधर मंदीरा एक दो बार अपने माँ बाप से मिलने गावं आयी, पर मेरी मुलाक़ात उससे नही हो पायी। मैं अपना समय बिताने के लिए , गावं के प्राथमिक विद्यालय मे आने जाने लगा। वहाँ बच्चों के साथ मेरा समय कट जता था। मैं बच्चों के साथ काफी घुल मिल गया था और बच्चे भी मुझे काफी प्यार करने लगे थे। ऐसे ही गावं मे आने के बाद ५ -५ साल बीत गए कुछ पता नही चला। एक दिन जाडे कि सुबह मैं बच्चों के साथ उनके स्कुल मे था। तभी एक बच्चा बदहवास दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बोला; "चंदर चाचा..... चंदर चाचा ....... अपके माँ कि तबियत खराब है अपको सब खोज रहे हैं..." मैं वहाँ से घर कि तरफ दौडा, देखा तो माँ बेसुध अपने कमरे मे चारपाई पर पडी थी। मैं उनको लेकर कर शहर के हस्पताल भागा, पर इश्वर कि मर्जी के आगे मैं हार गया। मेरी माँ का देहांत हो गया।

उनके क्रियाकरम के बाद मैं अपने घर मे चुप चाप बैठा था, शाम का वक़्त और चिड़ियों के घर लौटने के शोर ने मेरा मन को और भी ज्यादा खराब कर दिया था। तभी दरवाजे के पास कुछ आहट सी हुई मैं अपने कमरे से बाहर निकला तो देखा कि सामने मंदीरा और उसके पति खडे थे। मैं थोड़ी देर के लिए अवाक् रह गया। फिर मैंने उनको अन्दर बुलाकर बैठने को कहा। शायद मंदीरा के माँ बाप ने उनको खबर दे दी थी। करीब एक दो घंटे दोने मेरे साथ बैठे और फिर चले गए। चुकी मंदीरा के पति कंही बाहर काम करते थे इसलिये वो दुसरे दिन हमारे गावं से चले गए पर मंदीरा गावं मे ही रह गयी। वह करीब एक हफ्ते तक गावं मे रही और जब तक वो रही मेरा काफी ख़याल रखती। हर दिन वो मेरे खाने के लिए कुछ ना कुछ लेकर मेरे पास आती और हम घंटो बातें करते करते अतीत मे खो जाते। इस तरह हमारा पुराना रिश्ता फिर से ताजा होने लगा। एक हफ्ते बाद वो वापस अपने घर चली गयी।

अब मैं फिर से अकेला हो गया था, मंदीरा से मिलने के बाद अब मेरा मन बच्चों के साथ भी नही लग रहा था । ऐसे ही एक दिन बेचैन हो कर मैं मंदीरा से मिलने के लिए तुम्हारे कस्बे कि तरफ निकल पड़ा। पर मन मे हिचकिचाहट थी कि उसकी शादी हो गयी है और उसके पति भी बाहर काम करते हैं कैसे मिलूं । लोग क्या सोचेंगे। इसी कशमकश मे मैं तुम्हारे क़स्बा पहुंच गया। मेरा मन मेरे काबू मे नही था और मैं मंदीरा के घर पहुंच गया। दरवाजे पर आवाज दी तो एक २०-२२ साल का युवक आया, मैंने उससे मंदीरा के बारे मे पूछा। वो अन्दर गया और मंदीरा के साथ वापस आया। मंदीरा ने मुझे देखते ही अन्दर आने को कहा फिर उस युवक से मिलवाया - उसने बताया कि वह उसका छोटा बेटा है। उस दिन के बाद से मैं कभी कभी मंदीर से मिलने तुम्हारे कस्बे आने लगा। कुछ दिनों के बाद मंदीरा का छोटा बेटा भी बाहर पढने के लिए चला गया। अब मंदीरा भी अकेली हो चली थी। यह सोच कर मैं उससे मिलने के लिए हर हफ्ते आने लगा। इतना कह कर चन्द्रनाथ बाबू चुप हो गए।


कमरे मे एक खामोशी थी मैंने देखा उनकी आखें थोड़ी नम हो गयी थी। शायद बीते दिनों की याद ने उनके दर्द को फिर से हरा कर दिया था। उनको एकांत कि जरुरत थी इसलिये मैं पानी लेने के बहाने कमरे से बाहर चला गया। पानी लेकर वापस आया तो चन्द्रनाथ बाबू ने फिर एक सिगरेट सुलगा रखी थी। पानी पीने के बाद उन्होने अपनी घड़ी कि तरफ देखा और बोले पार्थो अब मैं चलता हूँ । मैं उनके साथ बस स्टोप तक गया रास्ते मे मैंने उनसे पूछा " आप बुधवार को ही उनसे मिलने क्यों आते हैं? " यह सुन कर चन्द्रनाथ बाबु ने मेरी तरफ देखा और खामोशी से आगे बढने लगे। कुछ देर आगे चलने के बाद उनहोंने कहा ....." उसी दिन मंदीरा कि शादी हुई थी और मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया था। "

उनको छोड़ने के बाद मैं वापस अपने घर चला आया था पर एक बात अब भी मन मे था कि इस उमर मे भी मंदीरा का कौन सा आकर्षण उन्हें यहाँ खीच लाता है।

आगे कि कहानी अगले पोस्ट में।

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