Monday, 2 July, 2007

दिल के अरमान




दिल के अरमान एक एक कर टूटे हैं
आखों मे बसें ख्वाब सभी झूठे हैं।

कैसे भुला दूँ मैं उसकी यादों को
मुह से लगे जाम भी क्या कभी छूटे है।

दिल से ना जाने कैसी खता हो गयी है
चांद को चाहा तो सितारे मुझ से रुठें हैं।

जिनको थाम के करना था खुशियों का सफ़र तय
वही हाथ मेरे हाथों से क्यों छूटे हैं।


गैरों से क्या करूं अपनी बर्बादी का शिकवा
मेरे ख्वाब तो मेरे अपनों ने ही लुटें हैं।

कैसे समेट लूं उन लम्हों को तहरीरों में
लिखने बैठा तो अल्फाज़ मुझ से रुठें हैं

अंतरा

1 comment:

Anonymous said...

Wah Wah wah! kya khubsurati se swanra hai... aise hi post karte rahiye...