Saturday 28 July 2007

एक ख़त अनजान शायर के नाम

कुछ दिन पहले एक अनजान शायर की कुछ गजलें और नज्में पढ़ने का मौका मिला और उनके काव्य की संवेदनशीलता और साफगोई ने मुझे ख़ासा प्रभावित किया। कोशिश करूंगा कि उनकी चंद बेहतरीन कृतियाँ आपके सामने रख सकूँ जो उनकी शख्सियत को आपके सामने ज़ाहिर कर सके। तब तक मेरा एक ख़त उस शायर के नाम है जिसे मैं आपके सामने पेश कर रह हूँ।

तेरी रूह से रूबरू हुआ ए शायर आज मैं
एक अरमान अब आखों मे है
यहाँ नही तो क्या हुआ, वहाँ तुमसे मिलूंगा जरुर।

तेरी महफ़िल का गवाह बन ना सका मैं
मौत से दोस्ती होने दे
एक रोज़ वहाँ महफ़िल मे रंग भारुगा जरुर

रंगीन दुनिया भी उसे फीकी नज़र आती है अब
सँभालने दो मुझको
एक रोज़ उसके चश्मे उतारूंगा जरुर।

गैरों कि बातों से परेशान है वो
मैं समझा रह हूँ
वक़्त मिले तो तुम भी उसे समझाना जरुर

Friday 27 July 2007

मेरे आँखों को संभाल के रखना


दरअसल ये कहानी मैंने अग्रसारित किये गए एक ई चिठ्ठी से उठाई है। इसलिये आप लोगों ने शायद पहले भी पढी होगी। मुझे अच्छी लगी.... मैं इसे आप लोगों के सामने रख रहा हूँ ।

रंजना एक अंधी लड़की है, वह अंधी है इसलिये अपने आप से बहुत नफरत करती है। नवनीत उससे बहुत प्यार करता है। नवनीत को छोड़ कर वो सब से नफरत करती है। एक दिन रंजना नवनीत से कहती है - यदि मैं दुनिया देख सकती तो कितना अच्छा होता, मैं तुमसे शादी कर सकती थी।

एक दिन किसी ने उसको अपनी आंख दान दिया। अब वो सब कुछ देख सकती थी। नवनीत ने उसे पूछा अब तो तुम सब कुछ देख सकती हो, क्या तुम मुझसे शादी करोगी। रंजना ने नवनीत कि तरफ देखा तो अचंभित रह गयी वो भी अँधा था। रंजना ने नवनीत को इनकार कर दिया।

नवनीत कि आँखों मे आंसू थे और वो उससे दूर जा रहा था और यही दुआ कर रह था- "मेरी प्यारी रंजना मेरे आँखों को संभाल के रखना "

हमारा साधुवाद और बिच्छू

बचपन मे एक कहानी पढी थी,....एक साधू सुबह सुबह नदी किनारे जाता है। वहाँ देखता है की एक बिच्छू पानी की धार मे बह रहा है। साधू उसे बचाने लगता है। इसी क्रम मे बिच्छू उसे कई बार अपना जहरीला डंक भी मार मारता है। अंततः साधू उसे बचा लेता है पर जहर के असर से खुद बेसुध हो जाता है।

आप लोगों मे से भी कुछ लोगों ने पढी होगी, मुझे यह समझ मे नही आता कि ऎसी कहानियाँ हमारे यहाँ ही बच्चों को क्यों पढ़ाई जाती है। दरअसल हम साधुवाद मे कुछ ज्यादा ही यकीन रखते है। यही बिच्छू अगर पडोसी चरमपंथी के यहाँ किसी नदी मे बह रहा होता तो वहाँ के मौलवी क्या एक आम आदमी भी उसका क्या करेगा यह सब को मालुम है।

एक बात और की उस साधू ने बिच्छू को बचा कर अच्छा नही किया खुद तो बेसुध पड़ा है और दुसरे कि जिंदगी भी ख़तरे मे डाल दी। यह कैसा साधुवाद है मेरी समझ मे नही आता। चरमपंथी हमे डंक पे डंक मारे जा रहे है हम अपनी सधुवादिता दिखा रहे है।

मुम्बई बम काण्ड, ट्रेन ब्लास्ट, प्लेन हाई जैक होता है, यहाँ तक की भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद पे ये बिच्छू डंक मारते हैं। क्या करते हैं हम उनको बचा कर औरों कि जिंदगी फिर ख़तरे मे डाल देते है। सारे आरोपी या तो बरी हो जाते है या उन्हें उमर क़ैद कि सज़ा दी जाती है एक आध को मौत कि सज़ा दी भी गयी तो हमारा साधुवाद सामने आ जाता है और वो फिर से आजाद हो जाता है।


हमे ऐसे ही सधुवादिता दिखाती रहनी चाहिऐ?

Tuesday 17 July 2007

मियां चिरौंजी लाल

चिरौंजी लाल जी एक नामी गिरामी कम्पनी मे कार्यरत है। "औधोगिक संबंध" विभाग मे बड़ा बाबु के पोस्ट पर काम करते हुए उनके संबंध काफी बडे दायरे मे है। संबंध बनाने मे माहिर चिरौंजी लाल जी हमारे कार्यालय मे टंगे हुए कुछ चित्रकारी से काफी प्रभावित हैं और उस चित्र का जो भावार्थ है उसे अपनी जिंदगी मे अमल लाने की जी-तोड़ कोशिश करते रहते हैं।

वो कहते हैं ना " जवानी का दीया बुढ़ापे मे एक बार जोर से फाद्फादाता है " चिरौंजी लाल जी के रिटायर होने मे एक दो साल बचे हैं। पर वह रे जवानी, आये दिन नीली फिल्म देखने के नए नए तरीके इजाद करते रहते है। मियां चिरौंजी को कंप्यूटर काम करने के लिए ही दिया गया है इसलिये वो इसका इस्तेमाल सौ प्रतिशत काम इच्छा मे ही लगते है। कंप्यूटर स्कैन करने पर सिस्टम फ़ाइल से ज्यादा काम कि फ़ाइल ही दिखेंगी आपको। बेचारे इस उमर मे भी इतना काम करते है किसी को इसकी फिकर ही नही है। पर चलो एक पंथ दो काज "इन्नोवेशन का इन्नोवेशन और काम का काम" भला इसमे कम्पनी को क्या एतराज हो सकता है।

" हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा " साहस हो तो आप बड़ी से बड़ी दरिया मे भी छलांग मर सकते हैं जनाना प्रसाधन (टॉयलेट) क्या बात है। चिरौंजी लाल जी के रूम से दस पन्द्रह कदम पे मरदाना प्रसाधन (टॉयलेट) अपनी जानी पहचानी महक के साथ उनके स्वागत के लिए हमेशा तैयार रहता है। पर हाय रे उसकी किस्मत मियां चिरौंजी वक़्त बरबाद करने मे यकीं ही नही रखते हैं और पास वाले जानना प्रसाधन मे ही कूद पड़ते हैं। ऐसे मे औधोगिक संबंध के साथ और भी कई संबंध अपने आप बन पड़ते हैं।

लाइफ मे जब तक अपने रिस्क नही लिया तब तक आपको कुछ हासिल नही हो सकता। धीरू भाई अम्बानी ने भी रिस्क ही लिया था कहॉ से कहॉ पहुंच गए। मियां चिरौंजी ने भी रिस्क लिया सड़क से हॉस्पिटल पहुंच गए और उनकी बसंती बाबु भाई के गैराज। हमारे यहाँ ऑफिस जाने का समय ९ बजे का है और १५ मिनट का ग्रेस इस लिए दिया जाता कि आप इसका इस्तेमाल अपने बुरे वक़्त मे करें। पर वाह रे मियां चिरौंजी ९ बजे से ९:१५ तक उनका बुरा वक़्त ही चलता है। ठीक ९:१३ पर उनकी बसंती धुआं का गुब्बार छोड़ती हुई लड़खड़ा कर पंच हाउस के पास रुकती है और मियां अपना कार्ड रगड़ मर कर आराम से ऑफिस जाते हैं। ९:१५ से पहले उनको खोजना भी रिस्क कि ही बात है।

कार्यों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता तो देखते ही बनती है। कोई रेफ़रेंस पेपर माँग कर देख लो आप उनसे आप भूल जायेंगे पर वो नही भूलते हफ्ते बाद भी पपेर आपके पास जरुर पहूँच जाएगा हालांकि उनका मुख्य काम फ़ाइल कि देख रेख करना ही है। ठीक ४:४५ पे चिरौंजी लाल जी का डेस्क काम करना बंद कर देता है। समय पर घर पहुँचने कि प्रतिबद्धता जो है, बरना उनकी गली के कुत्ते नाराज हो जाते हैं। उनकी बकरी दूध देना बंद कर देती है। बेगम साहिबा फिर उनका ही इन्तजार करती है। कम्पनी भी खुश है, आज कल ऐसे लोग मिलते ही कहॉ है।

ये शहर




लंबी उँची इमारतें हर कदम पर
एक घर मुझको दिखा नही कहीँ।

आते जाते लोगों की भिड़ बेशुमार
एक आदमी मुझको मिला नही कहीँ।

रास्ते हज़ार जाते हर तरफ
मंजिल मुझको मिला नही कहीँ।

बनते बिगड़ते रिश्तों की सौगात यहाँ
एक अदद दोस्त मिला नही कहीँ।

रौशनी से होती रंगीन रातें यहाँ
चहरे पे मुस्कान मिला नही कहीँ।

नकाब ही नकाब नजर आते हर तरफ
एक चेहरा मुझको मिल नही कहीँ।

ये शहर हमे जितना देता है
उससे ज्यादा ले लेता है कहीँ।

Monday 16 July 2007

वो कहते हैं



दिन के भिड़ मे कई सपने संजोता हूँ
पर तन्हाई में मैं भी कभी रोता हूँ ।
वो कहते हैं रातों को नही सोता हूँ
पर मैं भी खुली आंखों से कई रातें खोता हूँ।

Friday 13 July 2007

एक कहानी - अन्तिम कड़ी

यह सोचते-सोचते कि मंदीरा और चन्द्रनाथ बाबु के रिश्ते मे ऐसी क्या बात है जो चन्द्रनाथ बाबु को हर हफ्ते यंहा खिंच लाती है मैं वापस अपने घर चला आया। मैं फिर से उनके आने का इन्तजार करने लगा। बुधवार को मैं फिर से बस स्टोप पर पहुँचा। कई बस आये और चले गए पर चन्द्रनाथ बाबु नही आये। मैं हैरान था कि वो आये क्यों नही । शाम हो गयी थी मैं वापस अपने घर चला आया। उसके बाद वो कई हफ्ते हमारे कस्बे नही आये। मैं परेशान हो गया था की अखिर बात क्या है वो क्यों नही आ रहे है। मैं यह जानने के लिए उनके गावं चला गया। उनके घर पहुंचा तो देखा कि वो काफी बीमार है। मैं उनके सिरहाने जा कर बैठ गया। उनकी आखें बंद थी शायद सो रहे थे। शारीर बुखार से तप रहा था। जैसे ही उनके सर पे हाथ रखा तो वो जाग गए। मुझे अपने पास देख कर वो मुस्कुराएँ और पुछा ....पार्थो तुम कब आये? मैंने उनको बताया कि आपके नही आने से मैं बेचैन हो गया था इसलिये मैं आपको देखने के लिए यहाँ चला आया। उन्होने बताया कि उस दिन के बाद से उनकी तबियत खराब चल रही है उनको मियादी बुखार हो गया है। उन्होने मंदीरा के बारे मे पुछा। मैंने उनको बताया कि वो ठीक है। करीब दो तीन घंटे बैठने के बाद मैं वहाँ से वापस अपने घर चला आया।

ऐसे ही बुधवार के दिन मैंने देखा कि एक शख्स हमारे कस्बे कि तरफ आ रह है, जिसके आओ भाव बिल्कुल चन्द्रनाथ बाबु से मिल रहे है। मैं दौड़ कर उनके पास गया तो देखा कि चन्द्रनाथ बाबु ही है। पर काफी कमजोर लग रहे थे। शारीर और थोडा सामने कि तरफ झुक गया था और हाथ मे छाता के अलावा एक डंडा भी था जिसके सहारे वो चल रहे थे। मैंने उनसे उनका हालचाल पुछा और उनके साथ चले लगा। जब हम मंदीरा के घर के पास पहुंचे तो उन्होने मुझे भी अन्दर आने को कहा। मैं उनके साथ अन्दर चला गया। फिर उन्होने मेरा परिचय मंदीरा से कराया । मैंने देखा घर पे कोई भी नही था और मंदीरा खाना बाना रही थी। चूल्हे के पास ही उसने दो आसान लगा दिए और बैठेने का इशारा किया। उसके बाद वो हमारे लिए कुछ नास्ता पानी लेने अन्दर कमरे मे चली गयी। नास्ता देकर वो भी हमारे पास आकर बैठ गयी और फिर उसने चन्द्रनाथ बाबु से उनका हाल चाल पुछा। "जिंदगी समाप्ती कि तरफ है मैं उसकी परवाह नही करता , तुम भी ना करो तो अच्छा है " ऐसा कह कर चन्द्रनाथ बाबु खामोश हो गए और मंदीरा कि ऑंखें गीली होने को थी। यह देख मैं वहाँ से उठ कर आंगन मे चला आया। पर मेरा ध्यान उनकी तरफ ही था दूर से ही मैंने देखा कि दोनो एक दुसरे को निहार रहे है और दोनो कि आँखों मे आंसू बह रहे थे। कुछ देर बाद चन्द्रनाथ बाबु ने मुझे आवाज दी और कहा चलो अब जाने का वक्त हो गय है। जब मैं चन्द्रनाथ बाबु के पास पहुँचा तो देखा कि मंदीरा एक पान ला कर चन्द्रनाथ बाबु को दे रही है। चन्द्रनाथ बाबु ने पान लिया और बडे तृप्त मन से उसको चबाते हुए बहार निकलने लगे। फिर मैं उनको बस स्टोप तक छोड़ने साथ साथ गया। उनकी बस आई और वो चले गए ।
उस दिन के बाद फिर वो फिर मंदीरा से मिलने कभी नही आये. दो तीन हफ्ते हो गए फिर एक दिन उनके गावं से एक आदमी मेरे पास आया और उसने बताया कि उनकी तबियत बहुत खराब है आपको बुलया है। मैंने उनसे कहा आप चलिये मैं आता हूँ यह कह कर मैं मंदीरा के घर के तरफ जाने लगा। मैंने सोचा चलो मंदीरा को भी खबर दे देता हूँ। मैंने मंदीरा को बताया तो वो भी जाने के लिए निकल पडे,फिर हम दोनो एक तांगा किया और निकल पडे।
हम करीब ९ बजे के आस पास हम उनके गावं पहुंच गए। मंदीरा अपने घर चली गयी और मैं सीधा चन्द्रनाथ बाबु के पास चला गया। उनको देखा तो तो उनकी हालत बहुत खराब थी बुखार से शारीर तप रह था। सांस लेने मे भी काफी तकलीफ हो रही थी। वो काफी पीडा से गुजर रहे थे। आंखे बंद थी उनकी मैंने उनके सर पे हाँथ रखा तो उन्होने थोड़ी सी आंख खोली और बैठने का इशारा कर फिर से आंखे बंद कर ली। तभी मंदीरा भी अपने भाई के साथ वहाँ पहुंची उनको देख कर मंदीरा के आंख भर आये थे पर वो अपने जज्बात पर काबू करने कि कोशिश कर रहीं थी। मैंने धीरे से चन्द्रनाथ बाबु को बताया कि मंदीरा जी आयी हैं। चन्द्रनाथ बाबु ने मंदीरा कि तरफ देखा और आँखों से आंसू कि एक मोटी धर बह पडी। अब मंदीरा भी फुट फुट कर रोने लगी दोनो एक दुसरे कि तरफ देख रहे थे और रोये जा रहे थे। थोड़ी देर देखने के बाद चन्द्रनाथ बाबु के चहरे पे एक मुस्कान आयी और उन्होने अपनी आंखें बंद कर ली। फिर उसके बाद उन्होने आंखे नही खोली। शारीर ढीला हो गया था। पर चहरे पे अब भी वो मुस्कराहट बरकरार थी। मैंने उनके शारीर को छू कर देखा..... सांस रूक गयी थी धड़कन बंद थे..... चन्द्रनाथ बाबु हम लोगों को छोड़ कर चले गए थे। मंदीरा के आंसू रूक नही रहे थे।
एक जीवन इतिहास कि अन्तिम कड़ी का गवाह बन कर मैं चुप चाप यह सब देखता रहा। मैं उनके अन्तिम यात्रा मे भी उनके साथ था। शमशान पहुंच कर शव यात्री अन्तिम क्रिया क्रम की तयारी मे जुट गए। मैं अपने को उनसब से अलग कर नदी के किनारे जा कर बैठ गया था। अचानक चिड़ियों के घर लौटने के शोर से मेरी तन्द्रा टूटी तो देखा कि सूरज डूबने को है। थोडा धुआं अब भी आसमान कि तरफ उठ रहा था. शव यात्री कब घर लॉट चुके थे मुझे पता ही नही था. मैं भी उठा और यह सोचते सोचते कि इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ , मेरे कदम धीरे धीरे बढ्ने लगे।

आज भी मैं चन्द्रनाथ बाबु और मंदीरा के प्यार कि परिभाषा समझ नही पाया.....
......समाप्त ....

Wednesday 4 July 2007

एक कहानी- भाग ४

गावं आकर देखा तो सब कुछ बदल गया था। माँ बिल्कुल कमजोर हो गयी थी शायद पिताजी के मरने के बाद उनकी हालत और खराब हो गयी थी। अब मेरे पास घर और माँ की देखभाल के अलावा और कोई काम नही था । हालांकि माँ काफी कमजोर हो गयी थी फिर भी वह मेरी शादी के लिए फिर से जी तोड़ कोशिश मे जुट गयी। शायद उनको एक वारिस कि तलाश थी, खैर माँ अपने कोशिश मे कामयाब नही हो पायी क्यों कि मैं राजी नही हुआ। कई रिश्ते आये भी और चले गए।

इधर मंदीरा एक दो बार अपने माँ बाप से मिलने गावं आयी, पर मेरी मुलाक़ात उससे नही हो पायी। मैं अपना समय बिताने के लिए , गावं के प्राथमिक विद्यालय मे आने जाने लगा। वहाँ बच्चों के साथ मेरा समय कट जता था। मैं बच्चों के साथ काफी घुल मिल गया था और बच्चे भी मुझे काफी प्यार करने लगे थे। ऐसे ही गावं मे आने के बाद ५ -५ साल बीत गए कुछ पता नही चला। एक दिन जाडे कि सुबह मैं बच्चों के साथ उनके स्कुल मे था। तभी एक बच्चा बदहवास दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बोला; "चंदर चाचा..... चंदर चाचा ....... अपके माँ कि तबियत खराब है अपको सब खोज रहे हैं..." मैं वहाँ से घर कि तरफ दौडा, देखा तो माँ बेसुध अपने कमरे मे चारपाई पर पडी थी। मैं उनको लेकर कर शहर के हस्पताल भागा, पर इश्वर कि मर्जी के आगे मैं हार गया। मेरी माँ का देहांत हो गया।

उनके क्रियाकरम के बाद मैं अपने घर मे चुप चाप बैठा था, शाम का वक़्त और चिड़ियों के घर लौटने के शोर ने मेरा मन को और भी ज्यादा खराब कर दिया था। तभी दरवाजे के पास कुछ आहट सी हुई मैं अपने कमरे से बाहर निकला तो देखा कि सामने मंदीरा और उसके पति खडे थे। मैं थोड़ी देर के लिए अवाक् रह गया। फिर मैंने उनको अन्दर बुलाकर बैठने को कहा। शायद मंदीरा के माँ बाप ने उनको खबर दे दी थी। करीब एक दो घंटे दोने मेरे साथ बैठे और फिर चले गए। चुकी मंदीरा के पति कंही बाहर काम करते थे इसलिये वो दुसरे दिन हमारे गावं से चले गए पर मंदीरा गावं मे ही रह गयी। वह करीब एक हफ्ते तक गावं मे रही और जब तक वो रही मेरा काफी ख़याल रखती। हर दिन वो मेरे खाने के लिए कुछ ना कुछ लेकर मेरे पास आती और हम घंटो बातें करते करते अतीत मे खो जाते। इस तरह हमारा पुराना रिश्ता फिर से ताजा होने लगा। एक हफ्ते बाद वो वापस अपने घर चली गयी।

अब मैं फिर से अकेला हो गया था, मंदीरा से मिलने के बाद अब मेरा मन बच्चों के साथ भी नही लग रहा था । ऐसे ही एक दिन बेचैन हो कर मैं मंदीरा से मिलने के लिए तुम्हारे कस्बे कि तरफ निकल पड़ा। पर मन मे हिचकिचाहट थी कि उसकी शादी हो गयी है और उसके पति भी बाहर काम करते हैं कैसे मिलूं । लोग क्या सोचेंगे। इसी कशमकश मे मैं तुम्हारे क़स्बा पहुंच गया। मेरा मन मेरे काबू मे नही था और मैं मंदीरा के घर पहुंच गया। दरवाजे पर आवाज दी तो एक २०-२२ साल का युवक आया, मैंने उससे मंदीरा के बारे मे पूछा। वो अन्दर गया और मंदीरा के साथ वापस आया। मंदीरा ने मुझे देखते ही अन्दर आने को कहा फिर उस युवक से मिलवाया - उसने बताया कि वह उसका छोटा बेटा है। उस दिन के बाद से मैं कभी कभी मंदीर से मिलने तुम्हारे कस्बे आने लगा। कुछ दिनों के बाद मंदीरा का छोटा बेटा भी बाहर पढने के लिए चला गया। अब मंदीरा भी अकेली हो चली थी। यह सोच कर मैं उससे मिलने के लिए हर हफ्ते आने लगा। इतना कह कर चन्द्रनाथ बाबू चुप हो गए।


कमरे मे एक खामोशी थी मैंने देखा उनकी आखें थोड़ी नम हो गयी थी। शायद बीते दिनों की याद ने उनके दर्द को फिर से हरा कर दिया था। उनको एकांत कि जरुरत थी इसलिये मैं पानी लेने के बहाने कमरे से बाहर चला गया। पानी लेकर वापस आया तो चन्द्रनाथ बाबू ने फिर एक सिगरेट सुलगा रखी थी। पानी पीने के बाद उन्होने अपनी घड़ी कि तरफ देखा और बोले पार्थो अब मैं चलता हूँ । मैं उनके साथ बस स्टोप तक गया रास्ते मे मैंने उनसे पूछा " आप बुधवार को ही उनसे मिलने क्यों आते हैं? " यह सुन कर चन्द्रनाथ बाबु ने मेरी तरफ देखा और खामोशी से आगे बढने लगे। कुछ देर आगे चलने के बाद उनहोंने कहा ....." उसी दिन मंदीरा कि शादी हुई थी और मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया था। "

उनको छोड़ने के बाद मैं वापस अपने घर चला आया था पर एक बात अब भी मन मे था कि इस उमर मे भी मंदीरा का कौन सा आकर्षण उन्हें यहाँ खीच लाता है।

आगे कि कहानी अगले पोस्ट में।

Monday 2 July 2007

दिल के अरमान




दिल के अरमान एक एक कर टूटे हैं
आखों मे बसें ख्वाब सभी झूठे हैं।

कैसे भुला दूँ मैं उसकी यादों को
मुह से लगे जाम भी क्या कभी छूटे है।

दिल से ना जाने कैसी खता हो गयी है
चांद को चाहा तो सितारे मुझ से रुठें हैं।

जिनको थाम के करना था खुशियों का सफ़र तय
वही हाथ मेरे हाथों से क्यों छूटे हैं।


गैरों से क्या करूं अपनी बर्बादी का शिकवा
मेरे ख्वाब तो मेरे अपनों ने ही लुटें हैं।

कैसे समेट लूं उन लम्हों को तहरीरों में
लिखने बैठा तो अल्फाज़ मुझ से रुठें हैं

अंतरा

अश्कों की जगह....



अगर टपकता अश्कों के बदले लहू आखों से,
कोई किसी को फिर शायद ही रुलाता।

दिल टूटने कि होती जो आवाज,
तो तुम्हे दर्द का अंदाजा हो पता।



यादें ना आती जो खामोशी से चुपके चुपके,
तो मेरे घर कि रौनक होती तेरी महफ़िल से भी ज्यादा।

ना होता ग़र चांद में दाग
खूबसूरती का मुझे तोड़ मिल जाता।

ग़र करता ना कोई किसी से बेवफाई
तो शायरों मे मेरा नाम कहॉ से आता।

अंतरा