Thursday 21 June 2007

एक कहानी- भाग २

कहानी पे टिपण्णी करने वालों को धन्यबाद! लम्बा इन्तजार करना पड़ा इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ।

बुधवार का दिन, और जेठ कि गरमी, पसीने से बुरा हाल था। पर मन मे शांति थी कि आज फिर वो आदमी आने वाला था। हम सारे दोस्त हमेशा कि तरह उसी बस स्टोप के बगल वाले सिगरेट कि दुकान पर खडे थे। पर मेरा ध्यान बार बार हाईवे कि तरफ था और मैं उसके आने का इन्तजार कर रहा था। कुछ देर बाद देखा एक बस आकर रुकी । मैं चुपचाप बस स्टोप के पास चला गया। एक - एक कर के लोग उतरे, पर जिसे मैं खोज रहा वो नही उतरा। थोड़ी देर के लिए मैं परेशां हो गया । मैं सोचने लगा आज वो क्यों नही आये .... और सोचते सोचते मैं वापस जाने लगा । तभी देखा कि जिसे मैं खोज रह था वो हमारे कस्बे कि तरफ जा रहा है। शायद वो पिछे के दरवाजे से उतर गए थे।

खैर मैं उनके पिछे भागा। मन मे कई सवाल थे, सोच रहा था सब एक साथ ही पूछ डालूं... और जब उनके पास पहुंचा तो सांस फूल रहा था। मैं उनसे कुछ पूछ पता इससे पहले उन्होने मेरी तरफ बडे गौर से देखा और हलके से मुस्कुराएँ. मैंने उनको नमस्कार किया और अपने बारे मे बताया । पर आज उनका चेहर कुछ उदास दिख रह था .... कहॉ से पुछू कँहा से नही इसी उधेड़बुन में मैं उनके साथ आगे बढता चला जा रह था । तब तक हमारा क़स्बा आ गया और मेरी हिम्मत नही हुई उनसे कुछ पूछने की । और वो फिर उस औरत के घर चले गए ।

इसी तरह एक दो महिने गुजर गए और हम दोनों के बिच काफी घनिष्ठता हो गयी । हम दोनो एक दुसरे के बारे मे काफी कुछ जान गए थे।

ऐसे ही एक दिन चन्द्रनाथ बाबु फिर से हमारे कस्बे मे आये । उस दिन मेरे घर पर कोई कोई नही था और वो औरत भी कस्बे मे नही थी । इस बात से चन्द्रनाथ बाबु अनजान थें। मैंने उनको बताया कि आप जिससे मिलने जा रहें हैं वो घर पे नही है । फिर मैंने उनको अपने घर चलने का न्योता दिया , थोड़ी देर सोचने के बाद वो राजी हो गए।
हम घर पहुंचे ...और मैं उनके नास्ते का प्रबंध करने लगा। इस बिच हमारी बात चित होती रही । फिर मैंने उनको नास्ता दिया और सोचा अभी मैं सारे सवाल पूछ सकता हूँ । मैंने उनसे पूछा .... वो औरत आपकी क्या लगती है ? यह सुनते ही उनके चहरे पर कई सारे भाव आने- जाने लगे पर कुछ कहा नही। पानी का ग्लास जमीन पे रखा और फिर से नमकीन खाने लगे। अब मैं थोडा हिल गया था पर फिर भी हिम्मत कर के फिर पुछा ... आप एक खास दिन ही उनसे मिलने हमारे कस्बे मे क्यों आते हैं? उन्होने नास्ता खतम किया और एक सिगरेट जलायी। एक लम्बा काश लेकर छत कि तरफ देखा और बोले ..... बहुत लंबी कहानी है सुनना चाहोगे ? मैंने चुपचाप हामी भर दी।
चन्द्रनाथ बाबु ने आखें बंद की और अपने अतीत मे खो गए । मैं उनके पास बैठ कर सब सुनता रहा ।

मंदीरा से मेरी जान पहचान बचपन कि है। हम दोनो इस्लामपुर गाँव के एक ही स्कूल मे पढा करते थे। वो मुझसे एक क्लास नीचे पढ़ती थी। उसका परिवार गरीब था इसलिये वो नयी किताबें नही ख़रीद सकती थी । वो मुझसे मेरी किताब लिया करती थी । फिर बाद में वो मुझसे कुछ सवाल पूछने भी मेरे घर आने लगी । उस वक़्त हम क्लास ९ मे पढ़ते थे। ऐसे ही आने जाने के क्रम मे हमारी दोस्ती हो गयी। अब हम एक दुसरे से मिलने का बहाना खोजने लगे । इंटर तक हमारी दोस्ती प्यार मे बदल गयी। हम एक दुसरे को दिलों जान से चाहने लगे । हम छुप छुप कर मिलने लगे, इधर हमारा प्यार परवान चढ़ने लगा उधर इस बात कि खबर पुरे इस्लामपुर मे आग कि तरह फ़ैल गयी ।

अब हमारे सामने कई दीवारें खड्डी हो गयीं थी। चुकी हम ब्रह्मण परिवार से और पिताजी समाज मे कुछ ज्यादा रसूख रखते थे , मुझे उससे नही मिलने के लिए घर से दबाव दिया जाने लगा। घर मे मेरी शादी कि बात चलने लगी। और मैं मंदीरा से शादी करना चाहता था ।


उधर मंदीरा के घर पे भी मेरे पिताजी के लोगों ने दबाव डाला कि उसकी शादी कंही करवा दी जाय।

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