Thursday, 31 May, 2007

मोहब्बत


नमस्कार, आज ही क़ैद से छूट कर वापस आया हूँ । दरअसल शुक्र ग्रह से आये एक प्राणी ने शनिवार को मेरा अपहरण कर लिया था । कल ही मुझे छोड़ा है, साले ने बहुत सताया , रातों कि नींद, दिन का चैन सब चुराया । अब जबकि मैं छूट गया हूँ तो सोचा चलो फिर से आपलोगों को तंग करूं ।

मजबूर ये हालत इधर भी है उधर भी
तनहाई कि एक रात इधर भी है उधर भी
कहने को बहुत कुछ है मगर किससे कहे हम
कब तक यूं ही खामोश रहे और सहे हम
दिल कहता है दुनिया कि हर एक रस्म उठा दें
दीवार जो हम दोनो में है आज गिरा दें
क्यों दिल में सुलगते रहें लोगों को बता दें
हाँ हमको मोहब्बत है मोहब्बत ....
अब दिल में यही बात इधर भी है उधर भी ।

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